कुरूद। सेवा संकल्प पखवाड़ा के अंतर्गत आयोजित जिला स्तरीय चित्रकला, भाषण एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने विकसित भारत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल इंडिया और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर अपनी प्रतिभा और विचारों की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में पूर्व मंत्री एवं विधायक अजय चंद्राकर ने विद्यार्थियों से आत्मीय संवाद करते हुए शिक्षा, अनुशासन, नेतृत्व, जनभागीदारी और राष्ट्र प्रथम की भावना पर विचार साझा किए। वहीं, अपने पुराने विद्यालय परिसर में पहुंचते ही वे भावुक नजर आए और बचपन की स्मृतियां ताजा हो उठीं। उन्होंने कहा कि आज वे जहां हैं, जिस रूप में हैं और जिस मुकाम पर खड़े हैं, उसमें इस विद्यालय परिसर का बहुत बड़ा प्रभाव है।
कार्यक्रम में नगर पालिका अध्यक्ष ज्योति भानु चंद्राकर, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अध्यक्ष निरंजन सिन्हा, पिछड़ा वर्ग आयोग अध्यक्ष नेहरू निषाद, जिला पंचायत उपाध्यक्ष गौकर्ण साहू, जनपद पंचायत अध्यक्ष गीतेश्वरी साहू, रविकांत चंद्राकर, त्रिलोकचंद जैन, मंडल अध्यक्ष डॉ. लोकेश साहू, कल्याण सिंह, कृष्णकांत साहू सहित जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। प्रशासनिक एवं शिक्षा विभाग की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी मधुलिका तिवारी, तहसीलदार सूरज बंछोर, सहायक संचालक रघुनंदन वर्मा, एसडीएम पीयूष तिवारी, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी राजेश बैंस एवं बीआरसी कुलेश्वर सिन्हा सहित शिक्षक-शिक्षिकाएं, प्रतिभागी छात्र-छात्राएं, पालकगण, अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान श्री चंद्राकर ने प्रतिभागी छात्र-छात्राओं की चित्रकला प्रदर्शनी का अवलोकन किया और उनकी रचनात्मक प्रतिभा की सराहना की। उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों का भी उत्साहवर्धन किया। प्रतियोगिता में भाषण कला के 5 छात्र-छात्राओं का राज्यस्तरीय प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ, जबकि चित्रकला में 20 छात्र-छात्राओं का राज्यस्तरीय प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ। श्री चंद्राकर ने चयनित विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए उनकी प्रतिभा और रचनात्मक सोच की सराहना की।

स्कूल की चौखट पर लौटे अजय चंद्राकर, आंखों में तैर उठीं बचपन की यादें
वक्त बदला, जिम्मेदारियां बदलीं, मुकाम बदला… लेकिन स्कूल की चौखट पर कदम रखते ही अतीत जैसे फिर सामने आ खड़ा हुआ। पूर्व मंत्री एवं विधायक अजय चंद्राकर जब अपने पुराने विद्यालय परिसर पहुंचे तो बचपन की स्मृतियों ने उन्हें कुछ पल के लिए उसी दौर में पहुंचा दिया। कभी जिन गलियारों में सहपाठियों के साथ कदम बढ़ाए थे, जिन कक्षाओं में बैठकर भविष्य के सपने बुने थे और जिन शिक्षकों से जीवन की पहली सीख मिली थी, उसी परिसर में लौटकर वे पुराने दिनों को याद करते नजर आए।
श्री चंद्राकर ने कहा कि इस विद्यालय परिसर में आते ही बचपन आंखों के सामने घूम गया। उन्होंने अपने छात्र जीवन के प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जीवन में व्यक्ति कितना भी आगे बढ़ जाए और कितनी भी बड़ी जिम्मेदारियां उसके कंधों पर आ जाएं, लेकिन बचपन और विद्यालय की यादें मन के किसी कोने में हमेशा सुरक्षित रहती हैं।
श्री चंद्राकर ने कहा कि इस परिसर ने उन्हें केवल शिक्षा नहीं दी, बल्कि अनुशासन, सामाजिक सरोकार, नेतृत्व और लोगों के बीच रहकर काम करने की सीख भी दी। उनके अनुसार विद्यालय महज एक भवन नहीं, बल्कि जीवन की वह जगह है जहां सपनों ने पहली बार आकार लिया और व्यक्तित्व की नींव पड़ी।
जन-सहयोग से बना विद्यालय, यादों में आज भी जीवंत
श्री चंद्राकर ने कहा कि जन-सहयोग से निर्मित इस विद्यालय की संरचना आज की कई आधुनिक इमारतों की तुलना में भी मजबूत रही है। उन्होंने कहा, “मैं आज जहाँ पर हूँ, जैसा हूँ और जिस मुकाम पर खड़ा हूँ, उसमें इस परिसर का बहुत बड़ा प्रभाव है। इस विद्यालय ने मेरे व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”
उन्होंने कहा, “आज उसी परिसर में खड़े होकर लगा, जैसे समय कुछ पल के लिए ठहर गया हो। उसी विद्यालय की गलियों में मेरा बचपन फिर लौट आया। पुरानी यादें आंखों के सामने ताजा हो गईं और लगा, जैसे वर्षों पहले का वह विद्यार्थी आज फिर अपने विद्यालय की दहलीज पर खड़ा है।”
श्री चंद्राकर ने कहा कि विद्यालय की असली ताकत केवल उसकी इमारत नहीं, बल्कि उससे जुड़ा समाज होता है। जब पालक, शिक्षक, विद्यार्थी और जनप्रतिनिधि मिलकर किसी संस्था के विकास के लिए काम करते हैं, तो उसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देता है।
छात्र जीवन में समस्याओं को लेकर जनप्रतिनिधियों से संवाद
अपने छात्र जीवन का प्रसंग साझा करते हुए श्री चंद्राकर ने कहा कि विद्यार्थी अपने विद्यालय की समस्याओं को लेकर जनप्रतिनिधियों से संवाद किया करते थे। स्कूल में सुविधाओं की जरूरत हो या किसी समस्या का समाधान, छात्र अपनी बात विधायक अथवा मंत्री तक पहुंचाने की पहल करते थे।
श्री चंद्राकर ने कहा कि विद्यार्थियों में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना लोकतांत्रिक संस्कारों को मजबूत करती है। उन्होंने विद्यार्थियों से पढ़ाई के साथ समाज और देश से जुड़े विषयों को समझने का आह्वान किया।
अनुशासन से बनता है व्यक्तित्व
विद्यालयीन अनुशासन का उल्लेख करते हुए श्री चंद्राकर ने कहा कि उनके समय में शिक्षक अनुशासन को लेकर गंभीर रहते थे। गलती होने पर दंड भी मिलता था, लेकिन उसके पीछे विद्यार्थी के भविष्य को बेहतर दिशा देने की भावना होती थी।
श्री चंद्राकर ने कहा कि आज विद्यार्थियों के लिए अनुशासन का अर्थ केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि समय का सदुपयोग, लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता, बड़ों का सम्मान और अपनी जिम्मेदारियों को समझना भी है।
AI और डिजिटल इंडिया से जुड़े विद्यार्थियों के विचार
कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने विकसित भारत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंडिया जैसे विषयों पर चित्रकला, भाषण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी सोच रखी।
श्री चंद्राकर ने कहा कि AI और डिजिटल तकनीक आने वाले समय में शिक्षा, रोजगार, उद्योग और प्रशासन के स्वरूप को प्रभावित करेंगी। ऐसे में विद्यार्थियों को तकनीक के साथ ज्ञान और नवाचार की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए।
‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना पर जोर
राष्ट्र निर्माण पर चर्चा करते हुए श्री चंद्राकर ने कहा कि किसी भी योजना, कार्य और निर्णय के केंद्र में ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना होनी चाहिए। उन्होंने भारत की संस्कृति, सभ्यता और लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति सम्मान के साथ प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी पर जोर दिया।
श्री चंद्राकर ने कहा कि सूचना के वर्तमान दौर में अनेक प्रकार के नैरेटिव सामने आते हैं। विद्यार्थियों को तथ्यों को समझकर विवेकपूर्ण तरीके से अपनी राय बनाने की आदत विकसित करनी चाहिए।
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शिक्षा में क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने की जरूरत
शिक्षा के विस्तार पर श्री चंद्राकर ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लाभ केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी उच्च शिक्षा, आधुनिक तकनीक और बेहतर संस्थानों तक पहुंच मिलनी चाहिए।
श्री चंद्राकर ने कहा कि नए विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना तथा दूरस्थ क्षेत्रों तक शिक्षा का विस्तार क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
डिग्री के साथ कौशल भी जरूरी
युवाओं के भविष्य और रोजगार की चर्चा करते हुए श्री चंद्राकर ने कहा कि आज के दौर में केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को बदलती अर्थव्यवस्था और तकनीक के अनुरूप कौशल हासिल करना होगा।
श्री चंद्राकर ने कहा कि AI, डिजिटल सेवाओं, तकनीकी शिक्षा और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों की समझ युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है। शिक्षा और कौशल विकास का बेहतर समन्वय युवाओं को आगे बढ़ने में मदद करेगा।
शिक्षक राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण कड़ी
शिक्षकों की भूमिका पर श्री चंद्राकर ने कहा कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व को दिशा देने वाला मार्गदर्शक होता है। उन्होंने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के आदर्शों का स्मरण करते हुए शिक्षा और राष्ट्र सेवा के संबंध को रेखांकित किया।
श्री चंद्राकर ने कहा कि शिक्षक विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ संवेदनशीलता, अनुशासन, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक जिम्मेदारी और देश के प्रति कर्तव्य की भावना विकसित करें।
प्रतिभा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ें
कार्यक्रम के समापन संदेश में श्री चंद्राकर ने कहा कि विद्यार्थियों की प्रतिभा केवल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। चित्रकला में कल्पना, भाषण में विचार और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में भारतीय परंपरा—इन सभी को राष्ट्र निर्माण की भावना से जोड़ने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान, कौशल, अनुशासन, तकनीक और राष्ट्र प्रथम की भावना से तैयार होने वाली युवा पीढ़ी विकसित भारत की यात्रा में योगदान दे सकती है।
कार्यक्रम में विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले छात्र-छात्राओं की प्रस्तुतियों की सराहना की गई। राज्यस्तरीय प्रतियोगिता के लिए चयनित विद्यार्थियों को शुभकामनाएं दी गईं।
